संपादकीय: क्या बदला—केवल रिश्वत, या उसका तरीका?
विचार: सात दशक के नियम और भ्रष्टाचार की वही कहानी—आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?
समीक्षा: कागजी नियमों से आगे—रेलवे में जवाबदेही और भ्रष्टाचार की नई परतें
1950 से 2026 तक रेलवे में नियम-निर्देशों की किताबें मोटी होती गईं, लेकिन भ्रष्टाचार का प्रश्न आज भी ज्यों का त्यों कायम है।
भारतीय रेल केवल देश का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट नेटवर्क नहीं है; यह लाखों-करोड़ों रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढ़ांचा), कंस्ट्रक्शन (निर्माण), प्रोक्योरमेंट (खरीद), कॉन्ट्रैक्ट्स (ठेकों) और पब्लिक एक्सपेंडिचर (सार्वजनिक व्यय) का एक विशाल तंत्र है। इसलिए रेलवे में सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता केवल विभागीय आवश्यकता ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास का विषय भी है।
दिलचस्प बात यह है कि रेलवे में रिश्वतखोरी के खिलाफ नियमों की कभी कोई कमी नहीं रही। 1950 के दशक से लेकर आज तक नियम बनते गए, सतर्कता मशीनरी मजबूत होती गई, सीबीआई को जांच के अधिकार मिले, ट्रैप (छापे) होते रहे, गिरफ्तारियां होती रहीं और मुकदमे भी चले।
फिर प्रश्न उठता है—आखिर बदला क्या? रिश्वत—या केवल रिश्वत लेने का तरीका?
1. 1956: रेलवे ने भ्रष्टाचार को गंभीर समस्या माना
1956 में ‘रेलवे करप्शन इन्क्वायरी कमेटी’ की सिफारिशों के बाद रेलवे में भ्रष्टाचार के विरुद्ध संस्थागत मशीनरी को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए गए। प्रत्येक जोनल रेलवे में भ्रष्टाचार निरोधक संगठन बनाने की सिफारिशें स्वीकार की गईं।
अर्थात, भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई आज शुरू नहीं हुई—इसकी संस्थागत जड़ें लगभग सात दशक पुरानी हैं।
2. 1966: “पूर्ण सत्यनिष्ठा” केवल एक शब्द नहीं था
‘रेलवे सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1966’ में रेल कर्मचारियों के लिए “एब्सोल्यूट इंटीग्रिटी” (पूर्ण सत्यनिष्ठा) बनाए रखने का दायित्व निर्धारित किया गया। इसका अर्थ स्पष्ट था—रेलवे के कर्मचारियों और अधिकारियों से केवल काम करने की नहीं, बल्कि पूर्ण सत्यनिष्ठा की अपेक्षा की जाती है। इसके साथ ही, पर्यवेक्षक अधिकारियों (सुपरवाइजरी ऑफिसर्स) के लिए भी अपने अधीन कर्मचारियों की निष्ठा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी तय की गई थी।
3. 1976: स्पष्ट रेलवे जनरल रूल्स—“रिश्वत मत लो”
‘इंडियन रेलवे जनरल रूल्स’ के नियम 2.10(c) की भाषा किसी व्याख्या की मोहताज नहीं है:
“A railway servant shall … not solicit or accept illegal gratification.”
(अर्थात्: कोई भी रेल कर्मचारी अवैध पारितोषिक यानी रिश्वत न मांगेगा और न ही स्वीकार करेगा।)
यह कोई सामान्य सलाह (एडवाइजरी) नहीं थी, बल्कि एक कड़ा नियम था।
4. आज: विजिलेंस मैनुअल और सीबीआई की मौजूदगी
समय के साथ रेलवे का सतर्कता (विजिलेंस) तंत्र और विस्तृत हुआ। ‘इंडियन रेलवे विजिलेंस मैनुअल’ में रिश्वतखोरी, शिकायतों, ट्रैप मामलों, निवारक सतर्कता (प्रिवेंटिव विजिलेंस) और अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं हैं। सत्यनिष्ठा की शपथ (इंटीग्रिटी प्रॉमिस) में भी रेलवे की प्रतिबद्धता साफ झलकती है—“न रिश्वत लेंगे और न देंगे।”
यानी कागजों पर व्यवस्था पूरी तरह स्पष्ट है। लेकिन क्या वास्तविक धरातल पर स्थिति उतनी ही साफ है?
सीबीआई के हालिया मामले: कुछ गंभीर उदाहरण
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नीचे दिए गए मामले सीबीआई के आरोपों, एफआईआर, गिरफ्तारियों या न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों पर आधारित हैं। जहां अदालत ने अंतिम दोषसिद्धि (कनविक्शन) नहीं दी है, वहां किसी व्यक्ति को दोषी करार देना उचित नहीं है।
फिर भी, ये मामले यह प्रश्न उठाने के लिए पर्याप्त हैं कि भ्रष्टाचार निरोधक फ्रेमवर्क के बावजूद कथित भ्रष्टाचार किस तरह सामने आता रहा है।
- पारस रेलटेक (जम्मू): जम्मू से जुड़े एक सीबीआई मामले में ‘पारस रेलटेक प्राइवेट लिमिटेड’ और रेलवे/रेल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े अधिकारियों के विरुद्ध कथित रिश्वतखोरी और अनुचित पक्षपात (अनड्यू फेवर) के आरोप सामने आए। न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, लगभग ₹9.42 लाख की कथित रिश्वत और अधिकारी के आवास से लगभग ₹73 लाख नकद बरामद किए गए। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आरोप सीधे ठेकों, बिलों, अनुमानों (स्टीमेट्स) और आधिकारिक निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े थे।
- अरुण कुमार मित्तल (लखनऊ): दिसंबर 2022 में सीबीआई ने उत्तर रेलवे के तत्कालीन डिप्टी चीफ इंजीनियर (कंस्ट्रक्शन) अरुण कुमार मित्तल को ₹50,000 की कथित रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। आरोप ठेकेदार के बिलों के भुगतान में पक्षपात करने से जुड़ा था। इसके बाद हुई तलाशी में लगभग ₹1.38 करोड़ नकद और अन्य संपत्तियों का पता चला। यह प्रश्न गंभीर है कि निर्माण कार्य के बदले ₹50,000 से शुरू होने वाली यह कहानी जांच में करोड़ों तक कैसे पहुंच जाती है?
- तोमर कंस्ट्रक्शन (लखनऊ): उत्तर रेलवे से ही जुड़े एक अन्य मामले में तत्कालीन डिप्टी चीफ इंजीनियर-द्वितीय हरीश कुमार तथा तोमर कंस्ट्रक्शन से जुड़े व्यक्तियों के खिलाफ ₹5 लाख की कथित रिश्वत के मामले में कार्रवाई हुई। मामला ठेकेदार के लंबित भुगतानों को तेजी से निपटाने के एवज में अनुचित लाभ पहुँचाने से जुड़ा था।
- एचजी इन्फ्रा (H.G. Infra) मामला: रेलवे कंस्ट्रक्शन सेक्टर से जुड़े इस मामले ने इस बहस को और गंभीर बना दिया। सीबीआई ने निजी कंपनियों के अधिकारियों और रेलवे अधिकारियों के खिलाफ कथित रिश्वत नेटवर्क की जांच की, जिसमें भारी नकद बरामदगी भी शामिल थी।
क्या पैटर्न दिखाई देता है?
1950 और 1960 के दशक में भ्रष्टाचार का स्वरूप शायद अलग रहा हो, लेकिन आज जिन बिंदुओं का बार-बार उल्लेख होता है, वे हैं:
- कॉन्ट्रैक्ट्स (ठेके) और वर्क ऑर्डर
- बिल्स और पेमेंट्स (भुगतान)
- एस्टीमेट्स (प्राक्कलन) और वेरिएशंस (बदलाव)
- एक्सटेंशंस (समय-वृद्धि) और अप्रूवल (अनुमोदन)
- मेजरमेंट्स (माप) और अनड्यू फेवर (अनुचित पक्षपात)
यानी, आधुनिक रेलवे में कथित भ्रष्टाचार का दायरा केवल “किसने कितने पैसे लिए?” तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़ा प्रश्न यह है कि—“क्या विभागीय निर्णयों को निजी लाभ के लिए प्रभावित किया गया?”
नियमों की कमी नहीं है—तो फिर कमी कहाँ है?
यह कहना आसान होगा कि रेलवे में भ्रष्टाचार रोकने के लिए नए नियम बनाए जाने चाहिए, लेकिन उपलब्ध आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं—
- 1956: एंटी-करप्शन मशीनरी की शुरुआत
- 1966: एब्सोल्यूट इंटीग्रिटी (पूर्ण सत्यनिष्ठा) का नियम
- 1976: अवैध पारितोषिक पर स्पष्ट प्रतिबंध
- आज: विजिलेंस मैनुअल, सीवीसी, सीबीआई, ट्रैप, एफआईआर, गिरफ्तारियां और प्रॉसीक्यूशन (अभियोजन)
इसके बावजूद यदि बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी के मामले सामने आ रहे हैं, तो समस्या यह नहीं है कि “नियम नहीं हैं!” समस्या यह है कि—“नियमों का पालन और क्रियान्वयन कितना प्रभावी है?”
अब समय “करप्शन अकाउंटेबिलिटी रिपोर्ट” का है
यदि रेलवे बोर्ड वास्तव में पारदर्शिता को संस्थागत रूप देना चाहता है, तो उसे 1956 से 2026 तक की एक समेकित सार्वजनिक रिपोर्ट (कॉम्प्रेहेंसिव पब्लिक रिपोर्ट) जारी करनी चाहिए। इसमें निम्नलिखित आंकड़े स्पष्ट होने चाहिए:
- प्राप्त भ्रष्टाचार की कुल शिकायतें और विजिलेंस मामले
- सीबीआई जांच, ट्रैप और गिरफ्तारियों के आंकड़े
- विभागीय कार्रवाई, निलंबन और बर्खास्तगी
- अभियोजन स्वीकृति (प्रॉसीक्यूशन सेंक्शन), दोषसिद्धि (कनविक्शन) और बरी (एक्विटल) होने के मामले
- वर्ष-वार और जोन-वार आंकड़े
- ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़ से जुड़े प्रमुख मामलों के अंतिम निष्कर्ष
निष्कर्ष
सात दशक बाद जनता को केवल यह सुनना पर्याप्त नहीं है कि, “रेलवे में रिश्वत लेना मना है!”
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि—“क्या रेलवे में रिश्वत लेना मना है?” (इसका जवाब दशकों पहले दिया जा चुका है)।
असली प्रश्न यह है—“जब 1950 के दशक से रिश्वत के खिलाफ व्यवस्था मौजूद है, तो 2026 में भी ऐसे मामले क्यों सामने आ रहे हैं?” और क्या भ्रष्टाचार निरोधक मशीनरी केवल रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ने तक सीमित है, या वह उन तमाम परिस्थितियों को भी पहचानती है जो भ्रष्टाचार की गुंजाइश पैदा करती हैं?
नियम 70 साल पुराने हो सकते हैं, लेकिन जवाबदेही आज की होनी चाहिए!

