एक अधिकारी पर कितनी मेहरबानी करेगा रेल प्रशासन?
यह हमें एक व्हिसल ब्लोअर इनपुट प्राप्त हुआ है—BLW से!
#Railwhispers ने हमेशा #रोटेशन और प्रशासनिक #पारदर्शिता की बात की है। बनारस से मिले कई इनपुट पर हमने पहले भी लिखा है कि कैसे लंबे समय से पदस्थ अधिकारी वहाँ वेंडरों से वसूली करते हैं और माफियाराज चलाते हैं। चूंकि बाकी अधिकारी निर्धारित कम या अधिक समयावधि में वापस चले जाते हैं, मगर उत्पादन इकाईयों में दशकों से एक ही जगह जमे रहने से ग्रुप ‘बी’ अधिकारी सभी को यह संदेश देते हैं कि असली पॉवर #GM या #PHOD की नहीं—उनकी है। और एक तरह से यह सही भी है—रेल में पॉवर #PCME के पास या जीएम के पास नहीं, ऐसे ही तत्वों के पास है। फिटमेंट रिपोर्ट, परफॉरमेंस रिपोर्ट, शॉप फ्लोर पर जो वेंडर न सुने—न माने—उसके मटीरियल की तोड़-फोड़, जो कर्मचारी अनसुनी करे—उसकी शॉप फ्लोर पर मार-कुटाई। ये सब इसीलिए बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (#BLW) में वर्षों से होता आ रहा है, क्योंकि GM और PHOD से बड़े ये पुराने अधिकारी रहे हैं। और ये सब कुछ सबको पता है। पूर्वांचल के बाहुबली सरकार चलाते थे, DM, SP से कोई नहीं डरता था, मगर इनसे डरते थे। यही हाल ऐसे पुराने अधिकारियों का भी रहा है।
चूंकि लंबे समय से रहे हैं तो ट्रेड टेस्ट, GDCE/LDCE इत्यादि में सीधा दखल रहा। धीरे-धीरे स्टाफ को संदेश चला गया कि सुरक्षित रहना है तो इन माफियाओं के सामने झुकना होगा। शक्ति प्रदर्शन ऐसा कि कोई वरिष्ठ अधिकारी ऐसा नहीं जिसके साथ फोटो न हो या खुले तौर पर निकटता न हो। कोई क्योंकर आवाज उठा सकता है? जिसने उठाई, उसे इस सिंडिकेट ने नेस्तानाबूद कर दिया।
पूर्व जीएम नरेश पाल सिंह को यह श्रेय जाता है जिन्होंने अपने अल्प-कार्यकाल में BLW से ऐसे सभी लंबे समय से पोस्टेड अधिकारियों को बनारस से बाहर ट्रांसफर करवाया—ये लोग 25-30 सालों से बीएलडब्ल्यू, बनारस में ही पोस्टेड थे। सभी अपने-अपने नए स्थान पर चले गए, लेकिन एक अधिकारी मात्र साढ़े तीन महीने में ही #ECR से वापस #NER आ गया। NER की पोस्टिंग BLW वालों को वैसी ही है जैसी बड़ौदा हाउस—रेलवे बोर्ड वालों के लिए! तो यह अधिकारी ECR से NER आ जाता है। बाकी कुछ और कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती!
बड़े सवाल
व्हिसल ब्लोअर इनपुट ये बताते हैं कि पूर्व मध्य रेलवे (#ECR) से पूर्वोत्तर रेलवे (#NER) में ट्रांसफर करवाकर, ये महाशय लंबे समय से ‘वेटिंग फॉर पोस्टिंग’ में बीएलडब्ल्यू में अपने आवास पर हैं। हालाँकि इनके असमय-जुगाड़ ट्रांसफर का इनपुट पहले ही आ चुका था, लेकिन हमने इसे रूटीन समझा। नया इनपुट गंभीर इसीलिए हो गया, क्योंकि BLW में फिर से स्टाफ काउंसिल के चुनाव आ रहे हैं। हाल ही में स्टाफ काउंसिल के एक दबंग सदस्य के खिलाफ खड़े होने वाले एक कर्मी पर जानलेवा हमला हुआ। पहले भी स्टाफ काउंसिल की राजनीति के चलते BLW में एक मर्डर हुआ था। एससी/एसटी के नेता अमर सिंह—जिन पर हमला हुआ है—एक मुखर कर्मचारी हैं, जिन्हें BLW में लंबे समय से पोस्टेड रहे अधिकारी—जिन्हें हाल में #NPSingh ने ट्रांसफर करवाया था—के द्वारा शोषित और प्रताड़ित रहे हैं।

ये साहब जो वापस आ गए हैं NER में—उन्हीं कुछ अधिकारियों में से एक हैं। अमर सिंह का आधार एससी/एसटी कर्मचारियों से बाहर भी है, क्योंकि वह लेखनी और वाणी के धनी बताए जाते हैं। उन पर ये हमला इस वापस आए अधिकारी के निकटस्थ स्टाफ काउंसिल के एक दबंग से जोड़ा जा रहा है। अमर सिंह यदि जीतते हैं, तो पुराने बाहुबल पर चल रही BLW की राजनीति में आधारभूत परिवर्तन आ सकता है और ऐसे अधिकारियों की पकड़ बहुत ढ़ीली पड़ सकती है, जो लंबे समय से BLW में रहते हुए भ्रष्टाचार और गुंडई का केंद्र हैं। यह हमला पुराने वर्चस्व को बनाए रखने के प्रयास रूप में देखा जा रहा है।
बीएलडब्ल्यू के कर्मचारी—जो पुराने अधिकारियों के ट्रांसफर से बहुत खुश थे—वे अब भयग्रस्त हैं। जबकि कुछ पुराने पापी एक ही दर्द से पीड़ित हैं और ज्ञान दे रहे हैं कि मनपसंद पोस्टिंग का अधिकार तो सबको है—एक बार मिल तो लें। यानि किसी को भी पटाने में ये सब बहुत माहिर हैं। तो प्रश्न ये है कि क्या अब BLW फिर से खूनी राजनीति के दौर से गुजरेगा? और क्या अब फिर से भ्रष्टाचार और गुंडई का केंद्र बनेगा? यह आशंका BLW के उन सभी वेंडर्स ने भी जताई है, जिनसे हमने बात की और जो ‘गिरहकट’ के बार-बार बुलावे और गिरहकटी से तंग हैं! उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित अधिकारी—जिसकी यहाँ चर्चा हो रही है—के भी बुलावे बार-बार आ रहे हैं, जिससे वे बहुत परेशान हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें धमकी दी जा रही है कि “बस, कुछ दिनों की ही बात है, फिर तो हम यहीं बैठेंगे!”


इन अधिकारी महोदय का लंबे समय तक बनारस में ‘वेटिंग फॉर ड्यूटी’ बैठना, स्टाफ काउंसिल के चुनावों में सीधा हस्तक्षेप करना, स्टाफ काउंसिल के कई सदस्यों से उनसे निकट संबंध होना, नए चैलेंजर पर जानलेवा हमला, इस अधिकारी का लुकिंग ऑफ्टर जीएम और डबल एक्सटेंशन कॉन्ट्रैक्ट पर चल रहे चेयरमैन, रेलवे बोर्ड से नजदीकी संबंध—यहाँ के कर्मचारियों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। एक लायजनर का नाम तो खुलकर सामने आने लगा है, जो इस अधिकारी और PCME/NER का बहुत करीबी समझा जाता है। वहीं पूर्वोत्तर रेलवे के एजीएम भी अभी कुछ दिन पहले तक BLW में ही #PCE रहे हैं और इस अधिकारी के बहुत करीबी भी बताए जाते हैं। अर्थात् यह सिंडिकेट पुनः अपना फन उठा रहा है।
हम यह मानते हैं कि ऐसी स्थितियों में सच का पता लगाना कतई आसान नहीं है। कौन किसका नाम ले रहा है, और क्यों ले रहा है, उसका इस सब से क्या सरोकार है—ये भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। शायद इसीलिए यह आवश्यक है कि वरिष्ठ अधिकारी—किन लोगों के साथ उठते-बैठते हैं—उस पर वे अपना नियंत्रण रखें, चापलूसों से सावधान रहें। बनारस प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है, यहाँ पर प्रशासनिक अराजकता, अधिकारियों का माफिया जैसा व्यवहार ठीक नहीं। इसका संज्ञान स्वयं मोदी जी को लेना चाहिए, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रेलमंत्री को भी यह संज्ञान लेना ही चाहिए।
यदि स्टाफ काउंसिल के चुनावों में हिंसा पुनः चालू हो जाती है—जिसकी पूरी संभावना है—तो यह बनारस में उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के पुराने बाहुबली समय की वापसी होगी, जो कि न बनारस के लिए सही होगा, न ही BLW के लिए, और न ही यहाँ की वर्कफोर्स के लिए यह ठीक रहेगा। और इसकी सीधी जिम्मेदारी चेयरमैन-ऑन-कॉन्ट्रैक्ट, लुकिंग ऑफ्टर GM/BLW, AGM/NER और PCME/NER की होगी। नरेश पाल सिंह ने पुराने अधिकारियों के ट्रांसफर करवाकर वह कर दिखाया था जो यहाँ पहले के कई महाप्रबंधक चाहकर और बहुत जोर लगाकर भी नहीं कर पाए थे। उनके ट्रांसफर के बाद, इस अधिकारी के NER में ट्रांसफर ने बाकी सभी को वापसी का जुगाड़ दिखा दिया है।
नामित अधिकारियों के बारे में इनपुट और भी आए हैं, लेकिन हम मामले को सनसनीखेज नहीं करना चाहते, परंतु यदि बात निकलेगी तो निश्चित रूप से दूर तक जाएगी! जारी…

